Nirvana Shatakam | निर्वाण षट्कम्

परिचय

निर्वाण षट्कम् (Nirvana Shatakam) हे श्री आदि शंकराचार्य यांनी लिहिले आहे. आठव्या शतकात आदि शंकराचार्यांनी संपूर्ण अद्वैत वेदांत (अद्वैतवादी तत्त्वज्ञान) सहा श्लोकांमध्ये सारांशित केले आहे.

आत्मसाक्षात्काराकडे नेणाऱ्या चिंतन पद्धतींमध्ये प्रगती करण्यासाठी या श्लोकांना खूप मोलाचे मानले जाते.

आदि शंकराचार्य आठ वर्षांचे असताना गुरूच्या शोधात नर्मदा नदीकाठी फिरत होते. तिथे त्यांना एक ऋषी भेटले, ज्यांनी त्याला विचारले, “तू कोण आहेस?” लहान शंकराचार्यांनी या सहा श्लोकांसह उत्तर दिले, जे “निर्वाण षट्कम” किंवा “आत्म षट्कम” (Atma Shatkam) म्हणून ओळखले जातात. ‘आत्मा’ म्हणजे खरा ‘स्व’ आणि ‘निर्वाण’ म्हणजे पूर्ण स्वातंत्र्य आणि निरपेक्ष शांतीद्वारे परम आनंद.

ते ऐकून आदि शंकराचार्यावर ऋषी खूप प्रसन्न झाले आणि त्यांनी त्यांचा शिष्य म्हणून स्वीकार केला. ते ऋषी दुसरे कोणी नसून श्री गोविंदपाद आचार्य होते.

असे म्हणतात की निर्वाण षट्कमचा नियमितपणे श्रद्धेने आणि भक्तीने जप केल्याने मन:शांती, आनंद, आरोग्य, संपत्ती आणि समृद्धीची प्राप्त होते.

निर्वाण षट्कम् संस्कृत (Nirvana Shatakam Sanskrit)

मनोबुद्ध्यहङ्कार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥१॥

न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः
न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः ।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥२॥

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥३॥

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥४॥

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न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः ।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यं
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥५॥

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥६॥

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निर्वाण षट्कम् हिंदी अर्थ (Nirvana Shatakam Meaning in Hindi)

मैं न तो मन हूं, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त हूं
मैं न तो कान हूं, न जीभ, न नासिका, न ही नेत्र हूं ।
मैं न तो आकाश हूं, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं ॥१॥

मैं न प्राण हूं, न ही पंच वायु हूं
मैं न सात धातु हूं, और न ही पांच कोश हूं ।
मैं न वाणी हूं, न हाथ हूं, न पैर, न ही उत्‍सर्जन की इन्द्रियां हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं ॥२॥

न मुझे घृणा है, न लगाव है, न मुझे लोभ है, और न मोह
न मुझे अभिमान है, न ईर्ष्या ।
मैं धर्म, धन, काम एवं मोक्ष से परे हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं ॥३॥

मैं पुण्य, पाप, सुख और दुःख से विलग हूं
मैं न मंत्र हूं, न तीर्थ, न ज्ञान, न ही यज्ञ ।
न मैं भोजन (भोगने की वस्‍तु) हूं, न ही भोग का अनुभव, और न ही भोक्ता हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं ॥४॥

न मुझे मृत्यु का डर है, न जाति का भेदभाव
मेरा न कोई पिता है, न माता, न ही मैं कभी जन्मा था ।
मेरा न कोई भाई है, न मित्र, न गुरू, न शिष्य,
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं ॥५॥

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मैं निर्विकल्प हूं, निराकार हूं
मैं चैतन्‍य के रूप में सब जगह व्‍याप्‍त हूं, सभी इन्द्रियों में हूं ।
न मुझे किसी चीज में आसक्ति है, न ही मैं उससे मुक्त हूं,
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि‍, अनंत शिव हूं ॥६॥

निर्वाण षट्कम् इंग्लिश अर्थ (Nirvana Shatakam Meaning in English)

Neither am I the mind nor intelligence or ego,
Neither am I the organs of hearing (ears) nor that of tasting (tongue), smelling (nose), or seeing (eyes),
Neither am I the sky, nor the earth, neither the fire nor the air,
I am the ever-pure blissful consciousness; I am Shiva, I am Shiva,
The ever pure blissful consciousness. ॥1॥

Neither am I the vital breath, nor the five vital air,
Neither am I the seven ingredients (of the body), nor the five sheaths (of the body),
Neither am I the organ of speech, nor the organs for holding (hand), movement (feet), or excretion,
I am the ever-pure blissful consciousness; I am Shiva, I am Shiva,
The ever pure blissful consciousness. ॥2॥

Neither do I have hatred, nor attachment, neither greed nor infatuation,
Neither do I have passion, nor feelings of envy and jealousy,
I am not within the bounds of dharma (righteousness), artha (wealth), kama (desire), and moksha (liberation) (the four purusarthas of life),
I am the ever-pure blissful consciousness; I am Shiva, I am Shiva,
The ever pure blissful consciousness. ॥3॥

Neither am I bound by merits nor sins, neither by worldly joys nor by sorrows,
Neither am I bound by sacred hymns nor by sacred places, neither by sacred scriptures nor by sacrifices,
I am neither enjoyment (experience), nor an object to be enjoyed (experienced), nor the enjoyer (experiencer),
I am the ever-pure blissful consciousness; I am Shiva, I am Shiva,
The ever pure blissful consciousness. ॥4॥

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Neither am I bound by death and its fear, nor by the rules of caste and its distinctions, Neither do I have father and mother, nor do I have birth,
Neither do I have relations nor friends, neither spiritual teacher nor disciple,
I am the ever-pure blissful consciousness; I am Shiva, I am Shiva,
The ever pure blissful consciousness. ॥5॥

I am without any variation, and any form,
I am present everywhere as the underlying substratum of everything and behind all sense organs,
Neither do I get attached to anything, nor get freed from anything,
I am the ever-pure blissful consciousness; I am Shiva, I am Shiva,
The ever pure blissful consciousness. ॥6॥

Nirvana Shatakam (2023) | Vairagya Reprise | #soundsofisha
निर्वाण षट्कम्

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